| Paper Title | कबीर के काव्य में गुरु के महत्त्व और आध्यात्मिक चेतना का विश्लेषणात्मक अध्ययन |
| Author(s) | दीपचन्द्र |
| Country | India |
| Abstract | कबीर के काव्य में गुरु केवल धार्मिक दीक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि अज्ञान से ज्ञान, बाह्याचार से आत्मबोध और सामाजिक पहचान से आध्यात्मिक स्वतंत्रता की ओर ले जाने वाली शक्ति है। प्रस्तुत आलेख का केंद्रीय प्रश्न यह है कि निर्गुण ईश्वर और प्रत्यक्ष अनुभूति पर बल देने वाले कबीर गुरु को इतना ऊँचा स्थान क्यों देते हैं और उनकी दृष्टि में सच्चे गुरु की पहचान क्या है। कबीर-ग्रंथावली के ‘गुरुदेव कौ अंग’ में संकलित साखियों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि गुरु ज्ञान-दृष्टि खोलता है, शब्द के माध्यम से आत्मचेतना जगाता है, लोक-वेद के जड़ अनुकरण से साधक को मुक्त करता है और अहंकार तथा जातिगत पहचान के अतिक्रमण में सहायक होता है। किंतु कबीर किसी भी व्यक्ति को गुरु मान लेने की शिक्षा नहीं देते; वे अज्ञानी गुरु और निष्क्रिय शिष्य दोनों की तीखी आलोचना करते हैं। इस प्रकार उनके काव्य में गुरु-महिमा विवेक, आत्मानुभूति और आंतरिक परिवर्तन से जुड़ी है। कबीर की गुरु-दृष्टि आज भी ज्ञान, मार्गदर्शन और विवेकपूर्ण शिष्यत्व के संदर्भ में सार्थक दिखाई देती है। |
| Keywords | कबीर, गुरु, सतगुरु, निर्गुण भक्ति, आत्मबोध, ज्ञान, साधना। |
| Subject Area | हिन्दी साहित्य |
| Issue | Volume 1, Issue 2 (April - June 2026) |
| Published | 2026/04/06 |
| How to Cite | दीपचन्द्र (2026). कबीर के काव्य में गुरु के महत्त्व और आध्यात्मिक चेतना का विश्लेषणात्मक अध्ययन. सबद (Sabad), 1(2), 1–7. |
| License |
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