| Paper Title | महादेवी वर्मा के काव्य में प्रकृति और आत्मानुभूति |
| Author(s) | शालिनी यादव |
| Country | India |
| Abstract | महादेवी वर्मा के काव्य में प्रकृति केवल दृश्य-सौंदर्य अथवा काव्य-सज्जा का साधन नहीं है; वह कवयित्री की आत्मानुभूति को मूर्त, संवेद्य और व्यापक बनाने वाला प्रमुख माध्यम है। प्रस्तुत आलेख का केंद्रीय प्रश्न यह है कि महादेवी के यहाँ प्रकृति और आत्म के बीच संबंध केवल छायावादी मानवीकरण तक सीमित है अथवा वह आत्म की वेदना, विरह, स्मृति, आकांक्षा और आध्यात्मिक अन्वेषण की संरचना में अधिक गहरे स्तर पर सक्रिय है। रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत और दीपशिखा की विभिन्न कविताओं के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि रजनी, संध्या, मेघ, जल, पुष्प, तारे, क्षितिज और प्रकाश जैसे प्राकृतिक बिंब निजी अनुभूति को बाह्य जगत में रूपांतरित करते हैं। इसी प्रक्रिया में व्यक्तिगत वेदना करुणा और विश्वबोध की ओर बढ़ती है तथा सीमित आत्म असीम सत्ता से संबंध स्थापित करता है। फिर भी प्रकृति का अत्यधिक अंतर्मुखी और प्रतीकात्मक उपयोग कई बार उसकी स्वतंत्र भौतिक सत्ता को गौण कर देता है। इस अंतर्विरोध के बावजूद प्रकृति और आत्म के तादात्म्य की महादेवी की काव्य-दृष्टि हिंदी गीतिकाव्य की विशिष्ट उपलब्धि है। |
| Keywords | महादेवी वर्मा, प्रकृति, आत्मानुभूति, छायावाद, वेदना, रहस्यानुभूति, प्रकृति-बिंब। |
| Subject Area | हिन्दी साहित्य |
| Issue | Volume 1, Issue 2 (April - June 2026) |
| Published | 2026/05/08 |
| How to Cite | शालिनी यादव (2026). महादेवी वर्मा के काव्य में प्रकृति और आत्मानुभूति. सबद (Sabad), 1(2), 27–33. |
| License |
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