| Paper Title | प्रेमचंद के ‘गोदान’ में कृषक जीवन, आर्थिक शोषण और सामाजिक विषमता |
| Author(s) | प्रतिभा यादव |
| Country | India |
| Abstract | यह शोध-पत्र प्रेमचंद के ‘गोदान’ में चित्रित कृषक जीवन को आर्थिक अभाव की एकरेखीय कथा के रूप में नहीं, बल्कि श्रम, ऋण, लगान, जाति, लिंग, धार्मिक अनुशासन और सामुदायिक प्रतिष्ठा से निर्मित जटिल सामाजिक अनुभव के रूप में पढ़ता है। अध्ययन का उद्देश्य होरी के जीवन-संघर्ष तथा धनिया, गोबर और झुनिया जैसे पात्रों की स्थितियों के माध्यम से यह समझना है कि ग्रामीण उत्पादकता किसान को सुरक्षा क्यों नहीं दे पाती और शोषण के अलग-अलग तंत्र किस प्रकार एक-दूसरे को सहारा देते हैं। पात्रों, संवादों, कथा-प्रसंगों, कथावाचकीय टिप्पणियों और ‘गोदान’ की प्रतीकात्मक परिणति का विषयगत विश्लेषण औपनिवेशिक कृषि-संबंधों पर उपलब्ध सत्यापित ऐतिहासिक तथा आलोचनात्मक स्रोतों की सहायता से किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि होरी की त्रासदी केवल व्यक्तिगत दुर्बलता या अपव्यय का फल नहीं है; ऋण पर चढ़ता ब्याज, लगान की अपारदर्शिता, बिरादरी का दंड, धार्मिक व्यय, पारिवारिक उत्तरदायित्व और ‘मरजाद’ की आकांक्षा मिलकर उसके श्रम-फल का अपहरण करते हैं। धनिया का श्रम और प्रतिरोध इस व्यवस्था के भीतर वैकल्पिक नैतिक विवेक उपस्थित करता है, जबकि गोबर का असहमति-भाव पीढ़ीगत परिवर्तन को सामने लाता है। ‘गोदान’ साहित्यिक यथार्थ के माध्यम से उस ग्रामीण संरचना की आलोचना करता है जिसमें आर्थिक शोषण सामाजिक वैधता ग्रहण कर लेता है और सामाजिक विषमता आर्थिक निर्भरता को पुनरुत्पादित करती है। |
| Keywords | कृषक जीवन; ऋणग्रस्तता; महाजनी शोषण; जमींदारी; सामाजिक विषमता; स्त्री-श्रम। |
| Subject Area | हिन्दी साहित्य |
| Issue | Volume 1, Issue 2 (April - June 2026) |
| Published | 2026/04/17 |
| How to Cite | प्रतिभा यादव (2026). प्रेमचंद के ‘गोदान’ में कृषक जीवन, आर्थिक शोषण और सामाजिक विषमता. सबद (Sabad), 1(2), 20–26. |
| License |
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