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सबद – शोध पत्रिका

सबद

राष्ट्रीय, सहकर्मी-समीक्षित (पीयर-रिव्यूड) त्रैमासिक शोध पत्रिका

  ISSN: 3139-5317 (Online)
ISSN: 3139-5325 (Print)

Call For Papers - Volume 1, Issue 3 (July - September 2026)
Paper Title

पंत की कविता में ग्राम-जीवन : सौंदर्य, यथार्थ और सामाजिक चेतना

Author(s)रेनू गुप्ता
CountryIndia
Abstract

सुमित्रानंदन पंत की काव्ययात्रा में ग्राम-जीवन का प्रवेश केवल विषय-परिवर्तन नहीं, बल्कि उनकी काव्य-दृष्टि में आए महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का सूचक है। आरंभिक प्रकृति-केंद्रित सौंदर्यबोध से आगे बढ़ते हुए पंत जब ग्रामीण भारत की ओर देखते हैं, तब उनके सामने खेतों की हरियाली के साथ भूख, अभाव, अशिक्षा, शोषण, जर्जर जीवन और सामाजिक विषमता भी उपस्थित होती है। प्रस्तुत आलेख का केंद्रीय प्रश्न यह है कि पंत की ग्राम-कविता किस सीमा तक ग्रामीण जीवन की वास्तविक संरचना और अंतर्विरोधों को अभिव्यक्त कर पाती है तथा कहाँ कवि की पूर्ववर्ती सौंदर्य-दृष्टि और बाहरी पर्यवेक्षक की स्थिति उसकी सीमा बन जाती है। ग्राम्या की ‘ग्राम कवि’, ‘ग्राम चित्र’, ‘ग्राम श्री’, ‘वे आँखें’, ‘गाँव के लड़के’, ‘ग्राम युवती’, ‘धोबियों का नृत्य’ और ‘संध्या के बाद’ जैसी कविताओं के आधार पर स्पष्ट होता है कि पंत ने ग्राम को न तो केवल प्राकृतिक रमणीयता का पर्याय माना और न ही उसे एकरूप दैन्य-चित्र में सीमित किया। उनके यहाँ ग्राम प्रकृति, श्रम, विषमता, लोक-संस्कृति, करुणा और सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा का जटिल क्षेत्र बनकर सामने आता है।

Keywordsसुमित्रानंदन पंत, ग्राम-जीवन, ग्राम्या, सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण श्रम, प्रकृति, प्रगतिशील चेतना।
Subject Areaहिन्दी साहित्य
Issue Volume 1, Issue 2 (April - June 2026)
Published2026/04/15
How to Cite रेनू गुप्ता (2026). पंत की कविता में ग्राम-जीवन : सौंदर्य, यथार्थ और सामाजिक चेतना. सबद (Sabad), 1(2), 14–19.
License
Copyright © 2026 The Author(s). This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License (CC BY 4.0).

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