| Paper Title | निराला के काव्य में नारी-जीवन के विविध आयाम: सौंदर्य, श्रम, संघर्ष और सामाजिक यथार्थ |
| Author(s) | ऋचा सिंह |
| Country | India |
| Abstract | सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के काव्य में नारी-जीवन केवल सौंदर्य, प्रेम अथवा करुणा का विषय नहीं है, बल्कि वह सामाजिक विषमता, श्रम, पारिवारिक संबंध, जातिगत संरचना, विवाह-संबंधी रूढ़ियों और मानवीय स्वाभिमान से जुड़ी बहुआयामी अनुभूति के रूप में उपस्थित होता है। प्रस्तुत आलेख का केंद्रीय प्रश्न यह है कि निराला स्त्री को किस सीमा तक स्वतंत्र मानवीय सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं और कहाँ उनकी नारी-दृष्टि अपने युग के सांस्कृतिक आदर्शों तथा पुरुष-केंद्रित दृष्टि से प्रभावित रहती है। ‘जुही की कली’, ‘(प्रिय) यामिनी जागी’, ‘विधवा’, ‘वह तोड़ती पत्थर’, ‘रानी और कानी’, ‘प्रेम-संगीत’, ‘सरोज-स्मृति’ और ‘तुलसीदास’ के आधार पर नारी के प्रेमिका, विधवा, श्रमिक, पुत्री, निम्नवर्गीय स्त्री और प्रेरक व्यक्तित्व जैसे रूपों का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि निराला नारी के प्रति करुणा से आगे बढ़कर उसके श्रम और सामाजिक संघर्ष को काव्य के केंद्र में लाते हैं। यद्यपि अनेक प्रसंगों में स्त्री की अपनी वाणी सीमित है, फिर भी हिंदी कविता में नारी के सामाजिक और मानवीय अस्तित्व को व्यापक बनाने में निराला का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। |
| Keywords | निराला, नारी-जीवन, स्त्री-संवेदना, श्रम, सामाजिक यथार्थ, स्वाधीनता, छायावाद। |
| Subject Area | हिन्दी साहित्य |
| Issue | Volume 1, Issue 3 (July - September 2026) |
| Published | 2026/07/09 |
| How to Cite | ऋचा सिंह (2026). निराला के काव्य में नारी-जीवन के विविध आयाम: सौंदर्य, श्रम, संघर्ष और सामाजिक यथार्थ. सबद (Sabad), 1(3), 1–7. |
| License |
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