| Paper Title | समकालीन हिन्दी ग़ज़ल का सामाजिक-सन्दर्भ |
| Author(s) | जितेन्द्र |
| Country | India |
| Abstract | समकालीन हिंदी ग़ज़ल अपने पारंपरिक सौंदर्यबोध और भावनात्मक सीमाओं से आगे बढ़ते हुए आज के सामाजिक और राजनीतिक जीवन का सशक्त दस्तावेज़ बन चुकी है। ग़ज़ल का प्रारंभिक स्वरूप मुख्यतः प्रेम, शृंगार और निजी संवेदनाओं पर केंद्रित था, किंतु वर्तमान समय की परिस्थितियों ने इसे नए स्वर और दृष्टि प्रदान की है। अब यह विधा केवल अनुभूतियों की अभिव्यक्ति न रहकर समाज की ज्वलंत समस्याओं को उद्घाटित करने का माध्यम बन गयी है। वर्तमान ग़ज़लकारों ने अपने लेखन के माध्यम से महँगाई, ग़रीबी, बेरोज़गारी, प्रवासन, भ्रष्टाचार, उपभोक्तावाद, जातिवाद, लैंगिक असमानता और स्त्री को वस्तु समझने जैसे गंभीर प्रश्नों को स्वर दिया है। इन मुद्दों की प्रस्तुति केवल वर्णनात्मक नहीं बल्कि आलोचनात्मक और प्रतिरोधी दृष्टि से की गयी है। लोकतांत्रिक मूल्यों की दृष्टि से भी ग़ज़ल ने समानता, स्वतंत्रता और न्याय जैसे आदर्शों को सशक्त रूप में उभारा है। इस प्रकार समकालीन हिंदी ग़ज़ल केवल साहित्यिक विधा न रहकर सामाजिक यथार्थ का आईना बन गयी है। यह जनमानस के दुख-दर्द और संघर्षों को प्रतिबिंबित करने के साथ-साथ चेतना जगाने और परिवर्तन की आकांक्षा को स्वर प्रदान करती है। निस्संदेह, आज की ग़ज़ल साहित्य और समाज के बीच जीवंत संवाद की सेतु है। |
| Keywords | समकालीन हिन्दी ग़ज़ल, भूख, बेरोजगारी, पूँजीवाद, बाज़ार, महँगाई, वैश्वीकरण, स्त्री, जातिवाद, समाज, असमानता। |
| Subject Area | हिन्दी साहित्य |
| Issue | Volume 1, Issue 3 (July - September 2026) |
| Published | 2026/09/17 |
| How to Cite | जितेन्द्र (2026). समकालीन हिन्दी ग़ज़ल का सामाजिक-सन्दर्भ. सबद (Sabad), 1(3), 24–29. |
| License |
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