| Paper Title | प्रेमचंद पूर्व उपन्यासों में स्त्री-जीवन और सामाजिक यथार्थ |
| Author(s) | कु. आकांक्षा बाजपेई |
| Country | India |
| Abstract | हिंदी के आरंभिक उपन्यासों में स्त्री का चित्रण तत्कालीन सामाजिक, पारिवारिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों से गहरे रूप में जुड़ा हुआ दिखाई देता है। आरंभिक दौर में स्त्री-शिक्षा उपन्यासकारों के प्रमुख सरोकारों में रही, किंतु धीरे-धीरे स्त्री-पात्रों के चित्रण का क्षेत्र विस्तृत हुआ। स्त्री केवल शिक्षा प्राप्त करने वाली या आदर्श गृहिणी के रूप में ही नहीं, बल्कि पत्नी, प्रेमिका तथा सामाजिक रूढ़ियों से प्रभावित और उनसे जूझती हुई स्त्री के रूप में भी उपन्यासों में उपस्थित हुई। गृह-शिक्षा, परिवार, पति-पत्नी संबंध, प्रेम, विवाह तथा बाल-विवाह, दहेज, अनमेल विवाह, जातिगत भेदभाव, विधवा जीवन, देवदासी प्रथा और वेश्यावृत्ति जैसी सामाजिक समस्याओं के माध्यम से उसके जीवन की अनेक स्थितियाँ सामने आती हैं। ‘घराऊ घटना’, ‘बलवंत भूमिहार’, ‘श्यामा स्वप्न’, ‘स्वर्गीय कुसुम वा कुसुम कुमारी’, ‘स्वतंत्र रमा वा परतंत्र लक्ष्मी’, ‘ठेठ हिन्दी का ठाट’ तथा ‘सुंदर सरोजनी’ आदि उपन्यासों में स्त्री-जीवन के विविध रूप दिखाई देते हैं। इन रचनाओं में एक ओर पारंपरिक भारतीय स्त्री के आदर्श को स्थापित करने का प्रयास है, तो दूसरी ओर स्त्री की वास्तविक परिस्थितियों, उसकी इच्छाओं, प्रेम और सामाजिक पीड़ा को अभिव्यक्ति भी मिली है। इस दृष्टि से हिंदी के आरंभिक उपन्यासों में स्त्री-चित्रण परंपरा और परिवर्तन के बीच स्थित दिखाई देता है। |
| Keywords | हिंदी उपन्यास, स्त्री-जीवन, स्त्री-शिक्षा, परिवार, प्रेम, विवाह, सामाजिक यथार्थ, स्त्री-चेतना। |
| Subject Area | हिन्दी साहित्य |
| Issue | Volume 1, Issue 3 (July - September 2026) |
| Published | 2026/09/17 |
| How to Cite | कु. आकांक्षा बाजपेई (2026). प्रेमचंद पूर्व उपन्यासों में स्त्री-जीवन और सामाजिक यथार्थ. सबद (Sabad), 1(3), 14–18. |
| License |
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